Friday, May 23, 2008

एक रिश्ता निलासा

एक रिश्ता निलासा
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तेरी नीली आभा देखकर
खिंची आती हूँ मैं,
और रंग लेती हूँ खुदको
तेरे नीले रंग में

घंटों,
महीनों,
सालों.....

एक रिश्ता जुडता जाता है
निले रंग का!
दोनों को जोडने वाला

और समझने लगती हैं कई बातें....
जो पहले ना दिखी थी!

ये नीली आभा
हमेशा नीली ही नहीं होती,
कभी सतरंगी, सुनहरी भी दिखती है
कभी घनी घनी हो सिमटती है
हठ से रूठती है
गड़गडा़ के उधम मचाती है
रोती बिलगती है

मानो बच्चोंसी हरकतें करती है
कभी तू मुझसी ही लगती है....


स्वाती फडणीस.....................२२-०५-२००८

1 comments:

prajkta said...

तुमच्या बहुतेक कविता वाचल्या. मनापासून आवडल्या. खूप दिवसानंतर काहीसं वेगळ्या प्रकारचं लिखाण वाचल्याचं समाधान लाभलं. चिंचेवरील कविता लाजवाब.